Wednesday, February 4, 2009

थार मरुस्थल


थार मरुस्थल भारत के उत्तरपश्चिम में तथा पाकिस्तान के दक्षिणपूर्व में स्थितहै। यह अधिकांश तो राजस्थान में स्थित है!थार मरुस्थल अद्भुत है। गरमियों में यहां की रेत उबलती है। इस मरुभूमि में साठ डिग्री सेल्शियस तक तापमान रिकार्ड किया गया है। जबकि सरदियों में तापमान शून्य से नीचे चला जाता है। गरमियों में मरुस्थल की तेज हवाएं रेत के टीलों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती हैं और टीलों को नई आकृतियां प्रदान करती हैं।

जन-जीवन के नाम पर मरुस्थल में मीलों दूर कोई-कोई गांव मिलता है। पशुपालन (ऊंट, भेड़, बकरी, गाय, बैल) यहां का मुख्य व्यवसाय है। दो-चार साल में यहां कभी बारिश हो जाती है। कीकर, टींट और खेचड़ी के वृक्षकहीं-कहीं दिखाई देते हैं। इंदिरा नहर के माध्यम से कई क्षेत्रों में जल पहुंचाने का प्रयास आज भी जारी है।

मरुस्थल में कई जहरीले सांप, बिच्छु और अन्य कीड़े होते हैं।

राजस्थान में मरू समारोह (फरवरी में ) - फरवरी में पूर्णमासी के दिन पड़ने वाला एक मनोहर समारोह है। तीनदिन तक चलने वाले इस समारोह में प्रदेश की समृद्ध संस्कृति का प्रदर्शन किया जाता है।

प्रसिद्ध गैर व अग्नि नर्तक इस समारोह का मुख्य आकर्षण होते है। पगड़ी बांधने व मरू श्री की प्रतियोगिताएंसमारोह के उत्साह को दुगना कर देती है। सम बालु के टीलों की यात्रा पर समापन होता है, वहां ऊंट की सवारी काआनंद उठा सकते हैं और पूर्णमासी की चांदनी रात में टीलों की सुरम्य पृष्ठभूमि में लोक कलाकारों का उत्कृष्टकार्यक्रम होता है।

राजस्थान के ६० फीसदी हिस्से को थार मरुस्थल अपने में समेटे हुए है। दूर से देखने पर किसी को भी लग सकता हैकि मरुस्थल में होता ही क्या है, तो ऐसे लोगों को मैं बताना चाहूँगा कि यहाँ बहुत कुछ है।


थार मरुस्थल में कुछ ऐसेजीव-जंतु पाए जाते हैं जो दुनिया में और कहीं नहीं पाए जाते। इन दुर्लभ प्रजातियों में से कुछ को तो आईयूसीएन (इंटरनेशनल यूनियन फॉर कनजरवेशन आफ नेचर) ने अपनी रेड डेटा बुक में शामिल कर रखा है। लेकिनकुछ प्रजातियों तो उसकी नजरों से भी चूक गईं। ये प्रजातियाँ रेड डेटा बुक में शामिल प्रजातियों से भी ज्यादा दुर्लभहैं। इसका मुख्य कारण यह है कि इन प्रजातियों के बारे में ज्यादा लोग नहीं जानते इसलिए उनपर किसी प्रकार काशोध भी नहीं हुआ। ऐसी प्रजातियों को डेटा डेफिशियेन्ट कहा जाता है।

भारत के कई पौराणिक कथाओं में रेगिस्तान बैकड्राप निर्माण करता है और वर्तमान समयों में पर्यटक के इच्छुक स्थान कहा जाता है

थॉर या ग्रेट भारतीय रेगिस्तान एक मरूभूमि (८०० किलोमीटर ) दीर्घ है तथा (४०० किलोमीटर) गहरे है। यह भारत के उत्तर पच्चिम में और पाकिस्तान के पूर्वी दिच्चा में तथा पच्चिम पर इंडस सतलज नदी घाटी और पूर्वी पर आरवली रेजं के बीच स्थित है। च्चिफ् होनेवाले रेत ड्यून, टूटे पत्थर और स्क्रब पेड पौधे का मुख्यतः निर्जन क्षेत्र, यह २५ से मी से कम वार्षिक औसतम वर्षा प्राप्त करता है। बहुत ही कम जनसंख्या क्षेत्र में पेस्टोरल एकानमी उपलब्ध है। सतलज और बियस पानी बहाये गये कैनलों के विस्तार द्वारा, खेती ने कुछ जमीन कृषि के लिए उत्तर तथा पच्चिम कोनों में पा लिया है

अस्त के समय सैडं ड्यूनस पर ऊँट सवारी एक अपूर्व अनुभव है। यह जगह पुराने जमाने के कुछ बेहतर यादगाच्च्तों को अपने पास रखने का गर्व रखता है - राजमहल, कला, मंदिर तथा वास्तुकला तथा ऐतिहासिक मूल्य के अन्य खूबसूरत स्मारह चिन्ह और किसी भी आगन्तुक को अपूर्व न्योता दिलाता है।

डींगल भाषा

राजस्थान में भक्ति, शौर्य और श्रृंगार रस की भाषा रही डींगल अब चलन से बाहर होती जा रही है.अब हालत ये है कि डींगल भाषा में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध प्राचीन ग्रंथों को पढ़ने की योग्यता रखने वाले बहुत कम लोग रह गए हैं.

कभी डींगल के ओजपूर्ण गीत युद्ध के मैदानों में रणबाँकुरों में उत्साह भरा करते थे लेकिन वक़्त ने ऐसा पलटा खाया कि राजस्थान, गुजरात और पाकिस्तान के सिंध प्रांत के कुछ भागों में सदियों से बहती रही डींगल की काव्यधारा अब ओझल होती जा रही है!

जोधपुर विश्वविद्यालय में राजस्थानी भाषा विभाग के पूर्व अध्यक्ष और डींगल के विद्वान डॉक्टर शक्तिदान कबिया कहते हैं कि डींगल अभी जीवित तो है लेकिन इसे अपने वजूद के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.डींगल का शब्द भंडार अत्यंत समृद्ध है. इसमें एक-एक शब्द से तीस-तीस पर्यायवाची शब्द मौजूद हैं.

भारत के पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह डींगल के बड़े प्रशंसक हैं. उन्होंने जोधपुर में चारण कवियों के एक समारोह में डींगल की महत्ता का बयान किया.

राजस्थान में शायद ही कोई ऐसा हो जिसकी प्रशस्तियों में डींगल के गीत ना हों!कुछ आलोचक कहते हैं कि डींगल महलों और राजदरबारों तक ही सीमित रही लेकिन डॉक्टर कविया कहते हैं, "डींगल आम अवाम की ज़ुबान रही है."डींगल कवियों ने हर विषय पर कविताएँ लिखी हैं. बल्कि अनेक मौक़ों पर राजाओं को फटकार भी लगाई है.

बंगाल में भी जब आज़ादी के प्रति चेतना के स्वर नहीं फूट रहे थे तब राजस्थान में डींगल कवि स्वाधीनता के गीत लिख रहे थे.जोधपुर के राजकवि बाँकीदास ने 1805 में 'आयो अंग्रेज़ मुल्क के ऊपर' जैसा अमर गीत लिखकर राजाओं को उलाहना दिया था.डींगल गीतों का वाचन और गायन बहुत सरल नहीं है. इसमें विकटबंध गीत और भी कठिन माना जाता है!

डॉक्टर कविया एक विकटबंध गीत की मिसाल देते हैं जिसमें पहली पंक्ति में 54 मात्राएँ थीं, फिर 14-14 मात्राओं की 4-4 पंक्तियाँ एक जैसा वर्ण और अनुप्राश! इसे एक स्वर और साँस में बोलना पड़ता था और कवि गीतकार इसके लिए अभ्यास करते थे.

प्रसिद्ध साहित्यकार डॉक्टर लक्ष्मी कुमारी चूड़ावत चिंता के स्वर में कहती हैं कि यही हाल रहा तो डींगल का वजूद ही ख़तरे में पड़ जाएगा.वक़्त बहुत तेज़ी से बदल रहा है. ज़माना फ़ास्ट फूड का है. पहले जीभ का स्वाद बदला और अब मुँह की बोली भी पीछे छूटती जा रही है.

यह विडंबना ही है कि सदियों तक नीति और नैतिकता की सदा बुलंद करने वाली डींगल भाषा को अब अपने वजूद के लिए मदद की गुहार लगानी पड़ रही है.

कागलो


एक बार एक कागलो हो, बो इने-बिने फिरतो-फिरतो गरमी कारण तीसां मरण लाग्यो जणे अठिने-बठिने उडतो-उडतो पाणी कठई दिख जावे सोचतो-सोचतो भर गरमी मं थाकगो पण पाणी कठई नजर कोनी आयो, बो सोचण लागो जीवङा आज तो पाणी बिना मर जांवाला, भगवान् भली करे, एक माटी को घड़ो एक पेड़ नीचे पङ्यो नीजर आयगो, बी कागले री आंखां मं चमक आगी, अर बो तो घड़े काने उड़ान भरी अर जा बेठ्यो बी घड़े माथे अर बिमें झाँक घाली तो घड़े मं पाणी पिन्दे पङ्योङो दिख्यो अब बो सोचण लाग्यो घड़े को पाणी ऊपर कियां सके है, बो तिकडम बिठायी अर घड़े आरे-सारे पड्या कान्कारा एक-एक कर आपरी चांच सूं बी घड़े मं घालण लागो, थोड़ी भाँव मं पाणी ऊपर आयो जणे पाणी पियो और उडगो!

Tuesday, February 3, 2009

मारवाड़ी


मारवाड़ी भासा(also variously Marwari, Marvari, Marwadi, Marvadi) भारत रै राजस्थांन राज्य मांय बोली जावै, पण पागथिला राज्य गुजरात अर उगमणा पाकिस्तान मांय इणरा बोलणिया मिळै है.

13.2 मिलियन बोलणियौ साथै(1997 रा, ca. 13 मिलियन भारत रा राजस्थांन मांय अर 200,000 पाकिस्तान मांय) "राजस्थानी समुह" मांय सबसूं म्होठी बोली है. अर राजस्थांनी भारत री सबसूं म्होठी भासा है.

पैला मारवाड़ी नै महाजनी लिपी मांय लिखता अर अबार देवनागरी लिपी मांय लिखै है. मारवाड़ी नै अबार भणाई अर राज रा काम काजां मांय कोई मानता कोनी. लारला दिनां मांय केन्द्र सरकार माथै दबाव बणायौ है, कै इणनै मानता देय संविधान री 8मी सुची मांय सामल करै.

राजस्थांन सरकार मारवाड़ी भासा नै राजस्थांनी भासा रै नांव सूं नै मानता दे दि है.


मारवाड़



मारवाड़ भारत गणराज्य रै आत्मणी दिसा मांय राजस्थांन राज्य रै लंकाथमणौ (लंकऊ-आथणी) दिसा मांय आयौड़ौ है. मारवाड़ रौ घणखरौ भाग रण (रेतीलौ / धोरांवाळौ) है. थळी (Thar) मरुथळ रौ घणकरौ भाग मारवाड़ मांय आवै है. राजस्थांनी मांय "वाड़" रौ मतळब व्है, भोम (प्रदेस). लोग इयूं ई कह्‌वै है कै, मारवाड़ सबद संस्कृत रै "मरुवात" सबद सूं बण्योड़ौ है. मारवाड़ रौ मतळब व्हियौ... The Land of death.

मरणै नै जठै तैवार मांनै...... वा धरती है..........मारवाड़